छत्तीसगढ़

 ‘सेवा-संकल्प-अभियान’ : कोर्ट के चक्करों से मुक्ति और सुशासन की नई राह

  •  बदला जमीन मालिकों का जीवन
  • प्रशासनिक जटिलताओं और तारीखों का दौर हुआ खत्म

रायपुर, राजस्व विभाग से जुड़े काम हमेशा से पेचीदा, समय लेने वाले और आम नागरिक के लिए भारी मानसिक तनाव का कारण रहे हैं। भूमि के नामांतरण और सीमांकन में होने वाली लंबी देरी के कारण नागरिकों को अक्सर राजस्व न्यायालयों के चक्कर काटने पड़ते थे, जिससे उनके समय और धन दोनों की बर्बादी होती थी। ऐसी ही प्रशासनिक जटिलताओं और कोर्ट-कचहरी के फेर से जमीन मालिक वर्षों से जूझ रहे थे,जिन्हें अपनी पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार और सीमांकन को लेकर भारी अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा था। भूमि के नक्शों से जुड़ी विवादित स्थितियों और फाइलों के लंबे समय तक लंबित रहने से जमीन मालिकों की चिंताएं लगातार बढ़ रही थीं, और उन्हें डर था कि भावी पीढ़ी को भी यही पारिवारिक विवाद विरासत में मिलेंगे।

‘सरकार आपके द्वार’ और स्वतः ई-नामांतरण से मिला त्वरित समाधान

राज्य सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 में किए गए युगांतरकारी और जनोन्मुख संशोधनों के माध्यम से जब जन-राहत की यह व्यवस्था सीधे जनता तक पहुँची, तो जमीन मालिकों के जीवन में एक नया सवेरा आ गया। इन सुधारों के तहत सबसे बड़ी राहत स्वतः नामांतरण (Auto e-Mutation) की व्यवस्था के रूप में सामने आई। धारा 110 में किए गए क्रांतिकारी संशोधनों के चलते अब पंजीयन विभाग को ही नामांतरण का वैधानिक अधिकार मिल जाने से रजिस्ट्री के साथ ही नामांतरण की प्रक्रिया बेहद सुगम हो गई। जमीन मालिकों को यह बड़ा अधिकार मिल गया कि वह अपने जीवनकाल में ही अपने कानूनी वारिसों के नाम राजस्व अभिलेखों में सूचीबद्ध करा सके, जिससे भावी पीढ़ी के लिए पारिवारिक विवादों की गुंजाइश हमेशा के लिए खत्म हो गई।

डिजिटलीकरण और पारदर्शी सीमांकन से खत्म हुई अनिश्चितता

इसके अलावा, प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पूर्ण डिजिटलीकरण ने जमीन मालिकों की बची-खुची परेशानियों को भी पूरी तरह दूर कर दिया। धारा 33 के तहत नोटिस और आधिकारिक सूचना प्रेषित करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को कानूनी मान्यता मिलने से सूचनाएं समय पर मिलने लगीं, वहीं धारा 30 के अंतर्गत राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली में अभिलेखों, प्रकरणों और फाइलों के डिजिटल प्रेषण को अनिवार्य किए जाने से मामलों का त्वरित निपटारा संभव हो गया। भूमि सीमांकन और नक्शों से जुड़े पुराने विवादों का समाधान धारा 107 के तहत अधिसूचित जिओ-रेफ्रेंस्ड (Geo-Referenced) नक्शों की अधिमान्यता से हो गया, जिससे जमीन के सटीक आंकड़े और पारदर्शी सीमांकन तुरंत उपलब्ध हो गए। इसके साथ ही, धारा 70 के प्रावधानों ने यह सुनिश्चित किया कि कृषि जोत का आकार व्यावहारिक बना रहे और अनावश्यक विखंडन पर रोक लगे।

समय, धन और मानसिक तनाव की बचत: एक नया अध्याय

अब जमीन मालिकों को न तो तारीख-पर-तारीख के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं और न ही किसी जटिल प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। तकनीक-संचालित, पारदर्शी और जन-हितैषी राजस्व व्यवस्था ने इस परिवार के वर्षों के मानसिक तनाव, समय और धन को बचाते हुए उन्हें एक सुशासन और पूर्ण राहत से भरा जीवन प्रदान किया है।

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