छत्तीसगढ़

पीडिय़ा में घुली छत्तीसगढ़ की संस्कृति, पारंपरिक मिठाई ने विदेशों में बनाई पहचान

रायपुर। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में खानपान का विशेष स्थान है। यहां के पारंपरिक व्यंजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं, लोकजीवन और आस्था की कहानियां भी अपने भीतर समेटे हुए हैं। ऐसी ही एक खास मिठाई है पीडिय़ा, जिसकी सौंधी खुशबू दीपावली के दौरान घरों में त्योहार की मिठास घोल देती है। आधुनिक मिठाइयों की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद पीडिय़ा का पारंपरिक स्वाद और छत्तीसगढ़ी पहचान आज भी कायम है।

अलग-अलग परंपराओं में तैयार होती है पीडिय़ा

पीडिय़ा का लिखित इतिहास भले ही स्पष्ट रूप से उपलब्ध न हो, लेकिन छत्तीसगढ़ के ब्राह्मण और कुर्मी समाज की पारंपरिक पाक-कला में इसका खास महत्व रहा है। दोनों समुदायों में इसे तैयार करने की विधि में अंतर देखने को मिलता है।

ब्राह्मण परंपरा में चावल का आटा, घी, शक्कर और दही का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि कुर्मी परंपरा में चावल के आटे के साथ मावा, घी और शक्कर मिलाकर पीडिय़ा तैयार की जाती है। सामग्री और विधि में अंतर होने के बावजूद दोनों की खासियत इसका पारंपरिक स्वाद और विशिष्ट बनावट है।

दीपावली के अवसर पर पीडिय़ा बनाने की परंपरा घरों में उत्सव का माहौल और भी खास बना देती है। यही वजह है कि बाजार में कई तरह की आधुनिक मिठाइयां उपलब्ध होने के बाद भी इस पारंपरिक मिठाई की मांग और लोकप्रियता बनी हुई है।

भगवान राजीव लोचन को भी चढ़ाया जाता है प्रसाद

पीडिय़ा का महत्व केवल खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध धार्मिक आस्था से भी जुड़ा हुआ है। राजिम स्थित भगवान राजीव लोचन मंदिर में इसे प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता है। इससे इस मिठाई की सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता का पता चलता है।

छत्तीसगढ़ की परंपराओं में त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान पारंपरिक पकवान बनाने और बांटने की विशेष परंपरा रही है। पीडिय़ा इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो स्वाद के साथ आस्था और अपनत्व का भाव भी जोड़ती है।

बसंत दीवान ने घरों की रसोई से बाजार तक पहुंचाया

पीडिय़ा को घरेलू रसोई से व्यावसायिक बाजार तक पहुंचाने का श्रेय रायपुर के ब्राह्मणपारा निवासी प्रसिद्ध कवि एवं छायाकार स्वर्गीय बसंत दीवान को दिया जाता है। उनके प्रयासों से इस पारंपरिक मिठाई को व्यापक पहचान मिलने की राह खुली।

इसके बाद रायपुर के चंगोराभाठा निवासी स्वर्गीय नीलिमा शर्मा ने पीडिय़ा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रायपुर आने वाले कई विशिष्ट व्यक्तियों ने भी इस पारंपरिक मिठाई का स्वाद चखा और इसकी सराहना की। इनमें स्वर्गीय सुषमा स्वराज और मेनका गांधी के नाम भी शामिल हैं।

इन प्रयासों ने पीडिय़ा को केवल स्थानीय स्तर पर पसंद की जाने वाली मिठाई से आगे बढ़ाकर छत्तीसगढ़ की विशिष्ट पहचान के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया।

आलोक दुबे ने परंपरा को दी नई दिशा

नीलिमा शर्मा के निधन के बाद पीडिय़ा को आगे बढ़ाने की इस यात्रा में कुछ समय के लिए ठहराव आया। इसके बाद विशु कुटीर उद्योग के संचालक आलोक दुबे ने इस पारंपरिक मिठाई और छत्तीसगढ़ी पाक-कला को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शन से जुड़े अपने कार्य को छोड़कर उन्होंने पारंपरिक व्यंजनों को नई पहचान दिलाने की दिशा में काम शुरू किया। उनके प्रयासों में स्वाद की निरंतरता, गुणवत्ता और पारंपरिक विधियों को सहेजने पर विशेष जोर रहा।

भूपेश बघेल के मुख्यमंत्रित्व काल में दीपावली के अवसर पर विधायकों, सांसदों और राजभवन के लिए पीडिय़ा सहित छीट लड्डू, चाकोली, अनरसा और खाजा जैसे पारंपरिक व्यंजन तैयार करने का अवसर भी विशु कुटीर उद्योग को मिला। इससे छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पकवानों को व्यापक मंच पर प्रस्तुत करने का मौका मिला।

दुबई, अमेरिका और कतर तक पहुंचा छत्तीसगढ़ी स्वाद

आलोक दुबे के प्रयासों से पीडिय़ा की पहुंच छत्तीसगढ़ से बाहर भी बढ़ी। इस पारंपरिक मिठाई ने दुबई, अमेरिका और कतर जैसे देशों तक अपनी पहचान बनाई है। यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ के स्थानीय स्वाद और पारंपरिक पाक-कला के प्रति बढ़ती रुचि को दर्शाती है।

पीडिय़ा की खासियत इसकी कोमलता, विशिष्ट स्वाद और मुंह में घुल जाने वाली बनावट है। पारंपरिक सामग्री के सही अनुपात, बनाने की विधि और गुणवत्ता पर ध्यान देने से इसकी खास पहचान बनी रहती है।

विरासत को सहेजने की मिसाल है पीडिय़ा की यात्रा

पीडिय़ा की कहानी केवल एक मिठाई के बाजार में लोकप्रिय होने की कहानी नहीं है। यह उस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का उदाहरण है, जिसे समय के साथ नई पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है। बसंत दीवान की पहल, नीलिमा शर्मा के योगदान और आलोक दुबे के प्रयासों ने इस पारंपरिक मिठाई की पहचान को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई है।

आज पीडिय़ा छत्तीसगढ़ की माटी, लोकसंस्कृति और पारंपरिक खानपान का मधुर प्रतीक बन चुकी है। इसमें चावल के आटे, घी और शक्कर का मेल भर नहीं, बल्कि पीढ़ियों का अनुभव, त्योहारों की खुशियां और अपनी संस्कृति के प्रति जुड़ाव भी समाया है।

पीडिय़ा की मिठास यही संदेश देती है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें सहेजने और आगे बढ़ाने वाले लोग निरंतर प्रयास करते रहते हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की यह पारंपरिक मिठाई आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button